ख्वाबों की दुनिया मे रहता हूँ ,
आओ तुम्हें कुछ ख्वाब उधारी दे दूँ ,
चमक जाए चेहरे पर ख़ुशी की लाली ,
आओ तुम्हें कुछ ख्वाब उधारी दे दूँ ,
चमक जाए चेहरे पर ख़ुशी की लाली ,
ऐसी एक खुमारी दे दूँ ,
ये जो चाँद है •••चाँद नहीं है ! एक सागर है ,
नाव चलाओ तो उस पर,
मैं लहरों की रवानी दे दूँ ,
घोड़े दौड़ाओ तुम नभ मे ,
हाथ मे ले लो तुम सूरज ,
धडकनें सुनकर तो देखो ,
ख्वाबों की दुनिया मे रहता हूँ ,
आओ तुम्हे कुछ ख्वाब उधारी दे दूँ ,
नाव चलाओ तो उस पर,
मैं लहरों की रवानी दे दूँ ,
पहुंच जाओ बचपन मे ,
वो बचपन बहुत याद आता है ,
खेल खेलो कोई फिर से ,
खेल खेलो कोई फिर से ,
मै तुम्हे दादी की कहानी दे दूँ,
घोड़े दौड़ाओ तुम नभ मे ,
पर्वत लाँघ दो सारे,
पासा फैको कोई ऐसा ,
पासा फैको कोई ऐसा ,
ये सागर बांध दो सारे,दौड़ो तुम दरिया मे ,
तैरो तुम जमीं पर,
मैं तुम्हे
जरुरत का पानी दे दूँ ,
हाथ मे ले लो तुम सूरज ,
चंद्र लगाओ माथे पर ,
ये तारे नभ मे क्यों है ?
ये तारे नभ मे क्यों है ?
सजाओ इनको शाखों पर
हथेली खोल के देखो,
हथेली खोल के देखो,
धरा उस पर महसूस यूँ होगी ,
टपकी बूंद हो शबनम की कोई ,
टपकी बूंद हो शबनम की कोई ,
जैसे कलियों के किनारों पर,
बहरा जहान है सारा ,
बहरा जहान है सारा ,
शोर मचाओ तो सही ,
मैं तुम्हें एक आवाज क़रारी दे दूँ ,
मैं तुम्हें एक आवाज क़रारी दे दूँ ,
धडकनें सुनकर तो देखो ,
क्यूँ इतना शोर करती है ?
बात हवाॅओं से करलो ,
बात हवाॅओं से करलो ,
क्यों इतना जोर करती है ,
उड़ती रेत को कर लो ,
उड़ती रेत को कर लो ,
तुम जप्त अपनी हथेली मे ,
संगी लहरों के हो जाओ ,
संगी लहरों के हो जाओ ,
क्यूँ संघर्ष पुरजोर करती है ?
लगाम साधो बादलों पर ,
घुमाओ उल्टी वक्त की घड़ियाँ ,
जग झुककर पथ यूँ देगा ,
किनारे छोड़ कर जैसे ,
लगाम साधो बादलों पर ,
घुमाओ उल्टी वक्त की घड़ियाँ ,
जग झुककर पथ यूँ देगा ,
किनारे छोड़ कर जैसे ,
बहता हो कोई दरिया,
हौसला आजमाओ तो थोड़ा ,
राह तुम खोज लो नयी ,
पहचान करलो तुम इनकी ,
मैं तुम्हें जरुरत की निशानी दे दूँ ,
हौसला आजमाओ तो थोड़ा ,
राह तुम खोज लो नयी ,
पहचान करलो तुम इनकी ,
मैं तुम्हें जरुरत की निशानी दे दूँ ,
ख्वाबों की दुनिया मे रहता हूँ ,
आओ तुम्हे कुछ ख्वाब उधारी दे दूँ ,
चमक जाए चेहरे पर ख़ुशी की लाली,
ऐसी एक खुमारी दे दूँ !!!!!!!
ऐसी एक खुमारी दे दूँ !!!!!!!
*** अंकित चौधरी ***
आपकी लिखी रचना "साप्ताहिक मुखरित मौन में" शनिवार 21 अक्टूबर 2018 को साझा की गई है......... https://mannkepaankhi.blogspot.com/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "साप्ताहिक मुखरित मौन में" शनिवार 20 अक्टूबर 2018 को साझा की गई है......... https://mannkepaankhi.blogspot.com/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंमेरी रचना को शामिल करने के लिए आभार...
हटाएंbahut khoobsurat rachna....lajwab
जवाब देंहटाएंशुक्रिया आपका सादर ...
हटाएंThank you...
जवाब देंहटाएंये जो चाँद है ! चाँद नहीं है , एक सागर है ,
जवाब देंहटाएंनाव चलाओ तो सही उसपर,
मैं लहरों की रवानी दे दूं |
पहुंच जाओ बचपन में , कि बचपन बहुत याद आता है ,
खेल खेलो कोई फिर से ,कि मैं तुम्हे दादी की कहानी दे दूं ।
बहुत ही अनुपम कल्पनाओं से सुसज्जित रचना प्रिय अंकित जी | अनुराग का रंग शब्द शब्द छलक रहा है | सस्नेह शुभकामनाये |
सहृदय आभार आपका ,बस अपना स्नेह ऐसे ही बनाए रखिएगा...
हटाएंबहुत खूब 👌👌
जवाब देंहटाएंसहृदय आभार ...
हटाएंघोड़े दौड़ाओ तुम नभ में ,पर्वत लाँघ दो सारे,
जवाब देंहटाएंपासा फेंको कोई ऐसा ,ये सागर बांध दो सारे।
दौड़ो तुम दरिया में, तैरो तो जमीं पर,
कि मैं तुम्हे जरुरत का पानी दे दूं ।
बहुत पैनी धार है कल्पना की ..।। अति सुन्दर सृजन ।
सहृदय आभार ...
हटाएंEk nyi achhi kavita ke liye tahe dil se shukriyaa
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सहृदय आभार ...
हटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंसहृदय आभार ...
हटाएंआभार आदरणीय ...
जवाब देंहटाएंवाह!!!!
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर.... लाजवाब...।
सहृदय आभार ...
जवाब देंहटाएंआदरणीय अपनी रचना का शीर्षक दूनिया को दुनिया करें ! सादर
जवाब देंहटाएंसादर आभार आपका ...
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