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Monday, October 22, 2018

महफ़िल में नाम ना उछालो यूँ,

महफ़िल में नाम ना उछालो यूँ,
इंसान हूँ ,इंसान ही रहने दो। 
शोहरत अकेला कर देती,
गुमनाम हूँ ,गुमनाम ही रहने द!!


छलकता मय का प्याला ,
छींटे उड़ाना गैरों पर।  
डर लगता शराफत से मुझको ,
शराफत का समां है जोरों पर।
अब तो आँखें भी छलक उठीं मेरी  ,
ये पीड़ा अब मुझको सहने दो !
बदनाम हूँ ,बदनाम ही रहने दो!!

 बस अपनी खबर नहीं मुझको ,
खबर रखता ज़माने की सारी।  
टकराता पर्वत से यूं ही ,
है वीरानों से अपनी यारी।
बहता दरिया हूँ,मत रोको मुझे ,
बहता हूँ बस ,यूं ही बहने दो!!

अब तो ना रोको मुझको यूं,
जो कहनी है बात वो कहने दो!
पत्थरों से चिनवाओ मुझे ,
या ज़र्जर मकां सा ढहने दो!
इश्क ख़ता है गर मेरी ,
तो मुझको सज़ा में रहने दो!
गर बर्बादी तकदीर मेरी,
जो सहता हूँ ,वो सहने दो!!

औरों से क्या लेना मुझको  ,
जो कहता है वो ,उसे कहने दो!
दिल पर ना लेना बातों को,
बातों  में घुमाव जरा रहने दो!
मत घेरो दुनियादारी मे,
अनजान हूँ ,अनजान ही रहने दो!!!

***अंकित चौधरी ***

15 comments:

  1. Replies
    1. धन्यवाद आदरणीय सादर...

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  2. Replies
    1. धन्यवाद आदरणीय सादर...

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  3. बहुत सुंदर रचना

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  4. बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना 🙏

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  5. भावपूर्ण अभिव्यक्ति , अति सुंदर सृजन ।

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दर्जे दसवें ब्याह हो गया

दर्जे दसवें ब्याह हो गया , खुशियाँ  धरी रही सारी।