दर्जे दसवें ब्याह हो गया ,
खुशियाँ धरी रही सारी।
खुशियाँ धरी रही सारी।
डिबिया जलाती थी आँगन मे ,
डिबियाँ बुझी रही सारी।
गुड़िया संग खेलती वो तो ,
गुड़ियाँ धरी रही सारी।
गुड़ियाँ धरी रही सारी।
ख़्वाब गगन में उड़ने के ,
कतरे पर ! धरती पर पड़ी रही।
स्नेह लेखनी ,लिखना चाहे ,
स्याही ठंडी पड़ी रही।
अँगुरी में अँगुष्ठिका का अंगारा ,
मृगतृष्णा से जुड़ी रही।
बचपन लील गई ज़िम्मेदारी,
हृदय पर चले नित -नित नई आरी।
हृदय पर चले नित -नित नई आरी।
दर्जे दसवें ब्याह हो गया ,
खुशियाँ धरी रही सारी।।
***अंकित चौधरी ***
बहुत ही सुन्दर
जवाब देंहटाएंउत्साह बढ़ाने के लिए आभार ...
हटाएंबहुत ही सुन्दर
जवाब देंहटाएंउत्साह बढ़ाने के लिए आभार ...
जवाब देंहटाएंसमाज की कुछ विसंगतियों के शिकार होते राजते हैं समाज वाले ही ... ऐसी प्रथाओं और मान्यताओं से बाहर आना होगा ...
जवाब देंहटाएंप्रभावी रचना ...
सहृदय आभार आपका ...
हटाएंयथार्थ भाव पूर्ण रचना ।
जवाब देंहटाएंसहृदय आभार आपका ...
हटाएंसहृदय आभार आपका ...
जवाब देंहटाएंसुंदर रचना
जवाब देंहटाएंसहृदय आभार आपका ...
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
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