मंगलवार, 27 फ़रवरी 2024

एक बार फिर से

झांका हूँ जब-जब मैं दिल की गहराइयों में,

तेरा ही अक्श उभरता रहा है,

नयनो से तेरी ये जो बहता है पानी,

दिल में मेरे यूँ अखरता रहा है,,

जीने ना देती यें भीगी सी पलकें,

रविवार, 27 अगस्त 2023

भौतिक जगत

भौतिक जगत में उतर आए,

क्यों तुम प्रसिद्धि के पंख लगा कर? 

लौट चलो प्रकृति की तरफ,

पावन, सुलभ चरण बढ़ाकर। 

अलौकिक सौंदर्य खोज रहा,

तुम्हें पलकें बिछाकर। 

खो जाओ तुम भी उसमें, 

जीवन की चाह भुला कर।

शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

तेरे शहर में...

मुहब्बत का पैगाम पसंद है,

तेरे शहर में,

आज-कल हवा कुछ बदली बदली है,

शायद...

अफवाहों का बाजार गर्म है,

तेरे शहर में,


कुछ मेहमां आए थे चंद रोज़ के लिए,

जाते ही नहीं...

मंगलवार, 25 जनवरी 2022

वो रेशमी छांव थी

वो रेशमी छांव थी या एक तड़प में हंसी,

जिंदगी का ये मौसम बदल-बदल सा गया,

आज फिर से थे वो मेरे आमने-सामने,

दिल ये थम सा गया फिर मचल ही गया,

वो रेशमी छांव... 

सीमा पर एक खड़ा प्रहरी

हाथ में हथियार लिए,

आंखों में अंगार लिए,

सीमा पर एक खड़ा प्रहरी,

दिल में भारत मां का प्यार लिए,

कहानी उसकी तुम्हें सुनाऊ,

सर्दी की थी रात भारी,

आंखों से बहवगे आंसू, 

दिल में फूटेगी की चिंगारी,

सोमवार, 10 जनवरी 2022

जाहिल

 

जाहिल था, 

दिए उनके जहर को ,अमृत समझ कर पी गया,

जर्रा-जर्रा करके बिखरा हूँ पतझड़ की तरहा ,

मासूमियत उनकी -

बोले, जालिम क्या खूब जिंदगी जी गया,

दर्द को क्या समझेंगे मेरे ,वो फूलों पर चलने वाले,

एक कांटा क्या लगा ,

जख्मों को कोई आंसू के मरहम से सी गया,

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

उड़ जा चिरैया

अचानक माहौल हुआ ये कैसा? 

हवा क्यों खुश्क हो गई? 

आफताब क्यों मंद है?

धरा की सोंधी खुशबू कहां खो गई? 

एक चुनरी तार-तार नजर आई है अभी,

आशियां जला है किसी का ?

या फिर से कोई मासूम अपनी इज्जत खो गई,

सोमवार, 27 दिसंबर 2021

पागल है यह दुनिया सारी

जग है यह अजब निराला ,

क्या मैं भी उस मे खो जाऊं? 

पागल है यह दुनिया सारी ,

क्या मैं भी पागल हो जाऊं? 

पागल है कोई धन के पीछे, 

कोई पागल तन के पीछे। 

कोशिश करें कोई पहाड़ चढ़न की,

कोई पकड़ उसको खींचे।

दौड़ रहा है जग यह सारा ,

क्या मैं भी शामिल हो जाऊं?

रविवार, 26 दिसंबर 2021

लहू

गर्दिश में, हीरा भी धूल हो गया,

मौसम क्या बदला ,चूर-चूर हो गया,

राहगीर पूछते रहे बेताबी में ,पता उसका,

वह कभी मकां था, जो अब ख़राबा हो गया,


एक दरिया लड़ता रहा, रवानी को उम्र भर,

शनिवार, 25 दिसंबर 2021

टूटते तारे (कहानी)

"शिरिर-शिरिर" 

यह आवाज सूचक है, कि सुबह के 7:00 बज चुके है और यह मेरे जागने का समय है। यह आवाज मेरी माता जी की है, जो रोज सुबह मेरे लिए अलार्म का कार्य करती हैं। 

मैं हड़बड़ा कर उठा और बोला - मम्मी ,आपने मुझे फिर देर से उठाया , मुझे आज सुबह 6:00 बजे उठना था। 

यूँ तो मैं रोजाना देर से ही उठता हूँ। पर आज का दिन मेरे लिए कुछ खास है। इसलिए मैं रात को जल्दी ही सो गया था ताकि सुबह जल्दी उठ कर, 9:00 बजे तक अपनी क्लास मे पहुंच सकूं।  क्योंकि आज मुझे स्नेहा का जवाब मिलना था और मैं  रोजाना की तरह कम से कम आज तो लेट नहीं होना चाहता था...

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

आहट (उपन्यास )

बहुत दिनों से सोच रहा था कि आप सभी को एक ऐसे सफर पर ले जाया जाए जो रहस्य एवं रोमांच से पूर्ण हो। आखिरकार! मैं आप सभी के समक्ष उपस्थित हूँ अपना उपन्यास "आहट " लेकर। जिसे हमने आप सभी की सुविधा के लिए कुछ भागों मे विभाजित किया है। उन भागो को में क्रमशः प्रकाशित करता जाऊंगा ...

तो तैयार हो जाइए मेरे साथ एक ऐसे रहस्य और रोमांच से भरे सफर पर चलने के लिए ,जो आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाएगा।

                                  भाग-1


पहाड़ी इलाका, ठंड का मौसम ,जंगली पथरीला रास्ता...
उस पर एक घोड़ा-गाड़ी सरपट दौड़ी जा रही है। गाड़ी की छत से पानी की बूंदे चारों तरफ लटकी हैं... 

शायद सर्द हवाओं के कारण वातावरण में उपस्थित वाष्प की बूंदे  द्रवित होकर जम जाने के कारण एकत्रित हो गई हैं और डूबते हुए सूरज के हल्के प्रकाश मे जो पेड़ों के बीच से कभी-कभी प्रकट होता था ,प्रिज्म की तरह कार्य करके अपने प्रकाश से चमकते हुए सफ़ेद मोतियों का भ्रमक  आभास कराती हैं। 

ठंड का असर या शायद सफर की थकान का  असर घोड़ों  पर भी दिखाई पड़ता था जो बहुत ही  सुस्त से हो गए थे। फिर भी चालक जैसे ही उन पर अपने हाथ लगाता वह अपने वेग से दौड़े जाते थे।

रविवार, 21 नवंबर 2021

भूल गए

आपस में है प्यार बहुत, 

बस प्यार जताना भूल गए,

चाह बहुत संग जीने की ,

बस साथ निभाना भूल गए,


आह एक अकुलाई सी,

जब देखी आँख पथराई सी,

एक टीस उठी जब चोट लगी, 

बस दर्द बताना भूल गए,

गुरुवार, 11 नवंबर 2021

ग़र अज़ीज हो मेरे

 

रात घटाएँ आई थी घिरकर, 

हँवाओ मे अज़ब शोर था ।

वो आकर लौट गए दर से मेरे,

हम समझे कि कोई ओर था।

अफ़साना बन भी जाता कोई, 

कुछ मेरी बेख्याली शायद, 

कुछ रुसवाई का दौर था।।

सोमवार, 2 अगस्त 2021

अंदाज

 इस अंदाज से आँखे मिलाकर, पलकें झुका ली उसने,

हम बेजान से रह गए, रुह बाकी थी वो भी चुरा ली उसने,

दीदार को उसके नयन,भटकते रहे दर-बदर,

एक निशानी थी उसकी,वो भी छुपा ली उसने,

सोमवार, 26 जुलाई 2021

फरेबी पर्दा

आओ तुम्हे यूँ मजबूर कर दूँ , 

दिल खोलकर रख दूँ या चूर-चूर कर दूँ ,

ले जाओ छाँटकर , हिस्सा जो तुम्हारा है,

तुम्हारी बेख्याली मे भी तुम्हे मशहूर कर दूँ।

रविवार, 25 जुलाई 2021

जीवन

या जीवन का मोल बता,

या इसको फिर अनमोल बता, 

या तो इसको तौल बता,

 या राज फिर इसके खोल बता।

बुधवार, 19 मई 2021

गुजरा ज़माना

 क्या याद नहीं तुमको , वो गुजरा ज़माना ,

वो बाते मोहब्बत की, वो अपना अफ़साना,

आँखों ही आँखों मे दिन यूँ गुज़रते थे ,

लब कुछ कहने को रुकते थे, सम्हलते थे ,

वो आहों की गर्मी, वो ख्वाबों में बिखर जाना, 

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

धरती पुत्र

                                                             

कल धरती माँ रोई होगी,

पलकें यूँ  भिगोई होगी।                       

देख अपने पुत्र की हालत,

जाने कैसे सोई होगी  ।          

सियासत का जब जोर चला,

अंधियारो का फिर शोर चला।      

शोषण की जब सरकार हुई ,

चाहु ओर हाहाकार हुई।

ग़र हक की माँगो , खाओ लाठी ,

क्यूँ व्यवस्था इतनी लाचार हुई।

जब लाठी चली बुजुर्ग के पैरो पर,

बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

दर्जे दसवें ब्याह हो गया

दर्जे दसवें ब्याह हो गया ,
खुशियाँ  धरी रही सारी।

डिबिया जलाती थी आँगन मे ,
डिबियाँ बुझी रही सारी।
गुड़िया संग खेलती वो तो ,
गुड़ियाँ धरी रही सारी।

सोमवार, 22 अक्टूबर 2018

महफ़िल मे नाम ना उछालो यूँ

महफ़िल मे नाम ना उछालो यूँ ,
इसां हूँ ,इसां ही रहने दो , 
शोहरत अकेला कर देती ,
गुमनाम हूँ ,गुमनाम ही रहने दो ,

छलकता मय का प्याला ,
छींटे उड़ा ना गैरो पर ,